रिहायशी इलाके में खदान, दहशत में ग्रामीण, प्रबंधन विस्तार में मस्त

रिहायशी इलाके में खदान, दहशत में ग्रामीण, प्रबंधन विस्तार में मस्त


0 नियम-कानून को पलीता, शासन-प्रशासन, जनप्रतिनिधि मौन
0 लोगों को असुविधा कर खदान का निरीक्षण करने आते हैं सीएमडी
0 कौन सुनेगा ग्रामीणों की पुनर्वास, रोजगार, मुआवजा कटौती की पीड़ा? जमीन देकर भी घर से बेघर हो रहे हैं ग्रामीण!

कोरबा, छत्तीसगढ़:
देश की ऊर्जा राजधानी कहे जाने वाले कोरबा जिले में एक बार फिर कोयला खदानों के विस्तार ने ग्रामीणों की शांति छीन ली है। जिन किसानों ने देश और राज्य के विकास के लिए अपनी पुश्तैनी जमीनें खदानों को समर्पित कर दीं, आज वही किसान अपने हक, पुनर्वास, रोजगार और मुआवजे के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं।

कोरबा जिला, जहां से देश को सबसे ज्यादा कोयला राजस्व प्राप्त होता है, वहीं यहां के मूल निवासी आज भी अपने अधिकारों के लिए शासन-प्रशासन और एसईसीएल प्रबंधन के दरवाजे खटखटा रहे हैं। दुख की बात यह है कि शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधि इस गंभीर विषय पर मौन साधे हुए हैं।

नियमों का खुलेआम उल्लंघन, भय का माहौल

प्रशासन और कोल इंडिया के अधिकारी खदानों के विस्तार को प्राथमिकता देते हुए साम-दाम-दंड-भेद की नीति पर काम कर रहे हैं। झूठे मुकदमों और पुलिस कार्रवाई के ज़रिए ग्रामीणों में भय का माहौल बनाकर उन्हें उनकी ही जमीनों से बेदखल किया जा रहा है।
रिहायशी इलाकों के बीच किए जा रहे खनन और हेवी ब्लास्टिंग से ग्रामीणों का जीवन असुरक्षित हो गया है। कई घरों में दरारें आ चुकी हैं, दुर्घटनाएं हो चुकी हैं, पर कोई अधिकारी सुध लेने को तैयार नहीं।

सीएमडी और चेयरमैन का दौरा, पर समाधान नहीं

कोल इंडिया के चेयरमैन और एसईसीएल के सीएमडी लगातार खदानों का निरीक्षण कर रहे हैं, लेकिन ग्रामीणों की आवाज़ सुनने वाला कोई नहीं। वे खदानों के उत्पादन और विस्तार पर चर्चा कर चले जाते हैं, पर जो लोग अपने घरों से उजड़ रहे हैं, उनकी पीड़ा कोई नहीं सुनता।

सबसे बड़ा सवाल: किसानों की आवाज़ कौन सुनेगा?

भूमिपुत्रों की जमीन तो ले ली गई, लेकिन न उन्हें समुचित पुनर्वास मिला, न रोजगार, न उचित मुआवजा। क्या खनन मुनाफे के लिए लोगों की जिंदगी को दांव पर लगाया जाएगा?
क्या कोई जिम्मेदार अधिकारी या जनप्रतिनिधि आगे आकर इन किसानों की समस्याओं को सुलझाने की पहल करेगा?
या फिर यह अन्याय यूं ही चलता रहेगा?

यह खबर सिर्फ एक आवाज़ नहीं, बल्कि उस पूरे वर्ग की पुकार है जो विकास की कीमत अपने अस्तित्व से चुका रहा है।


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