 गनियारी छात्रावास में भ्रष्टाचार का बोलबाला:

जर्जर भवन और सीपेज के बीच मासूमों की जिंदगी खतरे में

बिलासपुर/ग्राम गनियारी –
खबर छत्तीसगढ़ की टीम की पड़ताल में गनियारी छात्रावास की हकीकत सामने आई है। यहां छोटे-छोटे मासूम बच्चों को जर्जर और सीपेज से भरे कमरों में रहने और सोने के लिए मजबूर किया जा रहा है।

छात्रावास के अधीक्षक डी.के. राठौर की देखरेख में बच्चों की पढ़ाई और रहन-सहन होना चाहिए, लेकिन हकीकत इसके उलट है। लगभग सभी कमरों में सीपेज और पानी का रिसाव लगातार बना हुआ है, जिससे बच्चों का रहना बेहद मुश्किल हो गया है। यहां तक कि आए दिन छात्र बीमार पड़ते हैं।

लाखों खर्च, फिर भी जर्जर

जानकारी के अनुसार हॉस्टल की छत पर ढलाई और मरम्मत का कार्य दो-दो बार कराया जा चुका है। इसके लिए करीब 3 करोड़ 65 लाख रुपए खर्च दिखाए गए, लेकिन नतीजा शून्य रहा। छत और दीवारों में घटिया क्वालिटी का सीमेंट-छड़ इस्तेमाल किया गया, जिससे भवन की हालत लगातार खराब होती जा रही है।

मिलीभगत का आरोप

ग्राम गनियारी हॉस्टल के चौकीदार का कहना है कि इस मरम्मत कार्य में अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत साफ झलकती है। आदिवासी सहायक आयुक्त कार्यालय और आदिवासी विकास विभाग की लापरवाही पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।

बच्चों पर डाला जा रहा अतिरिक्त बोझ

हॉस्टल में चौकीदार पद के नाम पर सहेंद्र पत्र को बच्चों की देखरेख और भोजन बनाने की जिम्मेदारी भी दी गई है। यहां 40-45 बच्चों का खाना बनाना और देखभाल करना उसके लिए बेहद कठिन हो रहा है।

बड़ा सवाल

लाखों-करोड़ों के बजट के बावजूद यदि हॉस्टल की हालत इतनी खस्ता है, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है? कब तक मासूम बच्चे सीपेज और जर्जर दीवारों के बीच बीमारियों और खतरे का सामना करते रहेंगे?


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