गुरुबालकदास जयंती: सतनाम आंदोलन के महानायक राजा गुरुबालकदास के संघर्ष और शहादत को जानने का अवसर

गुरुबालकदास जयंती: सतनाम आंदोलन के महानायक राजा गुरुबालकदास के संघर्ष और शहादत को जानने का अवसर

221वीं जयंती पर गुरुबालकदास के इतिहास, संघर्ष और सामाजिक योगदान को किया गया स्मरण

मुंगेली/छत्तीसगढ़। सतनाम आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता और गुरुघासीदास जी के उत्तराधिकारी गुरुबालकदास की 221वीं जयंती के अवसर पर गुरुघासीदास सेवादार संघ (GSS) की ओर से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके संघर्ष, सामाजिक योगदान और शहादत के इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने का आह्वान किया गया।

GSS के केंद्रीय संयोजक लखन ‘सुबोध’ ने कहा कि गुरुबालकदास का जन्म 18 अगस्त 1805 को हुआ था। गुरुघासीदास के देहावसान के बाद लगभग 1850 में उन्होंने सतनाम आंदोलन के नेतृत्व की जिम्मेदारी संभाली। उनके नेतृत्व में सतनाम विचारधारा और सामाजिक संगठन का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ तथा शोषित एवं वंचित समाज के अधिकारों की आवाज और मजबूत हुई।

भूमि अधिकारों के संघर्ष से जुड़ा सतनाम आंदोलन

GSS के अनुसार उस दौर में भूमि अधिकार सतनामी समाज के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न था। अंग्रेजी शासन द्वारा भूमि बंदोबस्त एवं मालिक मकबुजा व्यवस्था के तहत पुराने काश्तकारों और भूमि पर लंबे समय से काबिज लोगों के अधिकारों का रिकॉर्ड तैयार किया गया। संघ का दावा है कि सतनाम आंदोलन के दौरान जिन लोगों ने भूमि पर कब्जा कर अपनी आजीविका स्थापित की थी, उन्हें इस व्यवस्था से भूमि अधिकार मिलने की उम्मीद बनी।

इसी वजह से भूमि और अधिकारों को लेकर सामाजिक तनाव बढ़ा। GSS का कहना है कि गुरुबालकदास ने भूमि संबंधी विवादों में आम लोगों के पक्ष को मजबूती से रखा। विवादों में उनकी भूमिका और सामाजिक प्रतिष्ठा के कारण लोग उन्हें सम्मानपूर्वक ‘राजागुरु’ कहने लगे।

संघ के अनुसार सामंती और लोकदमनकारी शक्तियों ने गुरुबालकदास को उनके भूमि अधिकार संबंधी संघर्ष से दूर करने के लिए प्रलोभन देने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने समाज की जमीन और मेहनत को रोटी से जोड़ते हुए अपने लोगों के अधिकारों से पीछे हटने से इनकार किया।

1857 के दौर में बदला राजनीतिक परिदृश्य

GSS के इतिहास-विवरण में बताया गया है कि गुरुबालकदास के नेतृत्व का दौर भारत में बड़े राजनीतिक बदलावों का समय था। 1853 में नागपुर राज्य के शासक रघुजी तृतीय के निधन और उसके बाद नागपुर राज्य के ब्रिटिश शासन में विलय से छत्तीसगढ़ की प्रशासनिक व्यवस्था में भी परिवर्तन आया।

1857 के विद्रोह के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी के स्थान पर ब्रिटिश क्राउन का प्रत्यक्ष शासन स्थापित हुआ। इसके साथ प्रशासनिक और राजस्व व्यवस्थाओं में व्यापक बदलाव किए गए। GSS का मानना है कि इन राजनीतिक और प्रशासनिक परिवर्तनों का प्रभाव छत्तीसगढ़ के सामाजिक एवं भूमि संबंधों पर भी पड़ा।

इसी कालखंड में वीर नारायण सिंह जैसे जननायकों के संघर्ष और शहादत ने भी क्षेत्र के सामाजिक इतिहास को प्रभावित किया।

गुरुबालकदास की हत्या का षड्यंत्र—GSS का दावा

GSS के अनुसार गुरुबालकदास के बढ़ते प्रभाव और उनके नेतृत्व में मजबूत होते सतनामी संगठन से लोकदमनकारी शक्तियां चिंतित थीं। संघ का आरोप है कि उन्हें भूमि संबंधी सक्रियता से हटाने के लिए प्रलोभन दिए गए और असफल होने के बाद उनकी हत्या की साजिश रची गई।

GSS के इतिहास-विवरण के मुताबिक मुंगेली से लगभग 8 से 10 किलोमीटर दूर स्थित औराबांधा में रावटी के दौरान गुरुबालकदास पर रात में हमला किया गया। संघ का दावा है कि इस हमले में षड्यंत्रकारियों और समाज के भीतर मौजूद कुछ कथित भीतरघातियों की भूमिका रही।

हमले में गंभीर रूप से घायल गुरुबालकदास को उपचार और सुरक्षित स्थान की तलाश में भंडार की ओर ले जाने का प्रयास किया गया। GSS के अनुसार भंडार में उन्हें प्रवेश नहीं मिल सका, जिसके बाद उन्हें नवलपुर की ओर ले जाया गया। इसी दौरान नवलपुर से पहले कोसा गांव के पास 17 मार्च 1860 को उन्होंने अंतिम सांस ली।

इसके बाद उनके पार्थिव शरीर का नवलपुर में अंतिम संस्कार किए जाने का उल्लेख GSS ने अपने इतिहास-विवरण में किया है। संघ द्वारा प्रतिवर्ष उनकी स्मृति में समाधि मेला आयोजित किए जाने की भी जानकारी दी गई है।

शहादत के बाद सतनाम समाज में विभाजन का दावा

GSS का कहना है कि गुरुबालकदास की हत्या के बाद सतनामी समाज में भारी आक्रोश और क्षोभ उत्पन्न हुआ, लेकिन तत्कालीन परिस्थितियों, अफवाहों और कथित भीतरघात के कारण संगठनात्मक एकता प्रभावित हुई। संघ का आरोप है कि हत्या के जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध तत्कालीन प्रशासन ने प्रभावी कार्रवाई नहीं की।

GSS का यह भी दावा है कि गुरुबालकदास की हत्या के बाद सतनाम समाज के नेतृत्व और संगठन पर नियंत्रण को लेकर संघर्ष हुआ तथा कुछ लोगों को कथित तौर पर लोकदमनकारी शक्तियों के समर्थन से आगे बढ़ाया गया।

आगरदास को लेकर इतिहास में अलग-अलग मत

GSS के दस्तावेज में गुरुबालकदास की हत्या के बाद भंडार में आगरदास को गुरु गद्दी पर बैठाए जाने का उल्लेख है। आगरदास के गुरुघासीदास जी के पुत्र होने को लेकर समाज में अलग-अलग मत होने की बात भी दस्तावेज में कही गई है।

सफुरा माता और पवारा माता के संबंध तथा आगरदास की वंशावली को लेकर भी विभिन्न पारंपरिक मतों का उल्लेख किया गया है। GSS का कहना है कि इन विषयों पर ऐतिहासिक प्रमाणों की विस्तृत और निष्पक्ष समीक्षा की आवश्यकता है। संघ का मत है कि किसी व्यक्ति का मूल्यांकन केवल जन्म या वंश के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक भूमिका और सतनाम आंदोलन के प्रति योगदान के आधार पर होना चाहिए।

सामाजिक एकता और अधिकारों के लिए संघर्ष का आह्वान

GSS केंद्रीय संयोजक लखन ‘सुबोध’ ने कहा कि गुरुबालकदास जयंती केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। उनके संघर्ष, सामाजिक न्याय, भूमि अधिकार, स्वाभिमान और संगठनात्मक एकता के संदेश को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है।

उन्होंने समाज से इतिहास को जानने, तथ्यों पर अध्ययन करने और शोषित एवं वंचित वर्गों के न्याय तथा अधिकारों के लिए एकजुट होने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि गुरुबालकदास की शहादत को याद करने का वास्तविक अर्थ उनके संघर्ष के मूल उद्देश्यों—समानता, स्वाभिमान, सामाजिक न्याय, अधिकार और संगठन की एकता—को आगे बढ़ाना है।

लेखक: लखन ‘सुबोध’, GSS प्रमुख
जारीकर्ता: गुरुघासीदास सेवादार संघ (GSS)

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