

नोनबिर्रा गांव में 25 वर्षों से रह रहे ग्रामीणों का दावा- बिना नोटिस तोड़े गए घर, महिलाओं से मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप
पाली/कोरबा।
कोरबा जिले के पाली थाना क्षेत्र अंतर्गत ग्राम नोनबिर्रा के खलारीपारा में वन विभाग और पुलिस प्रशासन की कार्रवाई को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि 13 जून 2026 को वन विभाग के कर्मचारियों ने पुलिस बल के साथ मिलकर वर्षों से बसे आदिवासी परिवारों के घरों को बिना पूर्व सूचना और नोटिस के जेसीबी मशीन से ध्वस्त कर दिया।
ग्रामीणों के अनुसार, खसरा नंबर 597 की भूमि पर वे पिछले 25 वर्षों से निवास कर रहे थे। कार्रवाई के दौरान कई पक्के और कच्चे मकान तोड़ दिए गए, जिससे परिवारों का राशन, कपड़े, बर्तन और अन्य घरेलू सामान मलबे में दब गया।
महिलाओं से मारपीट के आरोप
पीड़ितों का आरोप है कि विरोध करने पर महिलाओं के साथ हाथापाई की गई और उन्हें जबरन घरों से बाहर निकाला गया। कुछ महिलाओं के हाथ और शरीर पर चोटें आने की भी बात कही गई है। ग्रामीणों ने घटना से जुड़े फोटो और अन्य दस्तावेज पुलिस को सौंपे हैं।
20 से अधिक परिवार प्रभावित होने का दावा
ग्रामीणों के मुताबिक इस कार्रवाई से करीब 20 परिवार प्रभावित हुए हैं। शिकायतकर्ताओं में तीज कुंवर, राम कुंवर, ललिता बाई, कांति बाई, शिवकुमारी बाई, श्याम बाई, भवरमति, राधा बाई, कमला बाई और कुलदीप सहित अन्य लोग शामिल हैं। पीड़ितों ने घरों और घरेलू सामान को हुए नुकसान का भी उल्लेख किया है।
‘कहीं भी जाओ, हमें मकान तोड़ना है’
ग्रामीणों का आरोप है कि जब उन्होंने बरसात के मौसम में बेघर होने की चिंता जताई तो अधिकारियों ने कथित रूप से कहा कि “तुम लोग कहीं भी जाओ, हमें मकान तोड़ना है।” इस कथित बयान को लेकर ग्रामीणों में भारी नाराजगी है।
पाली थाने में शिकायत, कार्रवाई की मांग
पीड़ित ग्रामीणों ने 14 जून को पाली थाना पहुंचकर लिखित शिकायत दर्ज कराई है। उन्होंने वन विभाग और पुलिस कर्मियों पर एफआईआर दर्ज करने, महिलाओं से दुर्व्यवहार करने वालों के खिलाफ कार्रवाई तथा बेघर हुए परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास देने की मांग की है।
प्रशासन का पक्ष आना बाकी
इस मामले में वन विभाग और जिला प्रशासन का आधिकारिक पक्ष अभी सामने नहीं आया है। यदि प्रशासन की ओर से कोई प्रतिक्रिया प्राप्त होती है तो उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।
चेतावनी
ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि उन्हें शीघ्र न्याय नहीं मिला तो वे आंदोलन और चक्काजाम जैसे कदम उठाने को मजबूर होंगे।

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