विकास की कीमत या प्रकृति का विनाश? थमना चाहिए पेड़ों का कटाना

विश्व पर्यावरण दिवस पर बड़ा सवाल: एक ओर पौधारोपण, दूसरी ओर हजारों पेड़ों की बलि


कोरबा/छत्तीसगढ़। 5 जून को पूरे विश्व में विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर पर्यावरण संरक्षण, हरियाली बढ़ाने और प्राकृतिक संसाधनों के संवर्धन का संदेश दिया जाता है। छत्तीसगढ़ में भी पर्यावरण एवं पर्यावरण विकास समिति, वन विभाग तथा छत्तीसगढ़ पर्यावरण संरक्षण मंडल द्वारा व्यापक स्तर पर पौधारोपण एवं जनजागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
लेकिन इसी बीच एक बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है—क्या विकास की कीमत प्रकृति के विनाश से चुकाई जाएगी?
जानकारी के अनुसार रेलवे क्षेत्र में विकास और विस्तार परियोजनाओं के नाम पर बड़ी संख्या में वर्षों पुराने हरे-भरे वृक्षों की कटाई की जा रही है। जिन पेड़ों ने दशकों तक पर्यावरण संतुलन बनाए रखा, लोगों को छाया दी और जीव-जंतुओं को आश्रय प्रदान किया, वे आज विकास कार्यों की भेंट चढ़ रहे हैं।
पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि एक ओर लाखों रुपये खर्च कर पौधारोपण अभियान चलाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर हजारों परिपक्व वृक्षों को काटा जाना पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्यों पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। उनका मानना है कि एक बड़ा वृक्ष तैयार होने में वर्षों लग जाते हैं, जबकि उसके बदले लगाए गए पौधों को उसी स्तर तक पहुंचने में दशकों का समय लगता है।
विशेषज्ञों का भी मानना है कि विकास आवश्यक है, लेकिन विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाए रखना उतना ही जरूरी है। यदि विकास परियोजनाओं में वृक्षों की कटाई अपरिहार्य हो, तो उसके विकल्प के रूप में पर्याप्त संख्या में पौधारोपण और उनके संरक्षण की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है कि आखिर कब तक विकास के नाम पर प्रकृति की कीमत चुकाई जाती रहेगी? पर्यावरणविदों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि अनावश्यक वृक्ष कटान पर रोक लगाई जाए तथा विकास कार्यों में पर्यावरणीय संतुलन को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
सवाल यही है—क्या हम विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित कर पाएंगे, या फिर आने वाली पीढ़ियों को हरियाली की जगह सिर्फ कंक्रीट के जंगल ही विरासत में मिलेंगे?

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