बिलासपुर का ‘खाकी न्याय’ : जब रक्षक ही भक्षक के संरक्षक बन जाएं!

बिलासपुर का ‘खाकी न्याय’ : जब रक्षक ही भक्षक के संरक्षक बन जाएं!

विशेष रिपोर्ट | खबर36गढ़ वेब डेस्क
बिलासपुर (छत्तीसगढ़)
छत्तीसगढ़ की कानून व्यवस्था को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। बिलासपुर जिले के मस्तूरी थाना क्षेत्र से सामने आए घटनाक्रम ने न केवल पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर उंगली उठाई है, बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ—पत्रकारिता—की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।
यह मामला पत्रकार डी.पी. गोस्वामी और उनकी पत्नी दिव्या गोस्वामी से जुड़ा है, जो सूत्रों के अनुसार बीते कुछ समय से भय और मानसिक दबाव के माहौल में रह रहे हैं। आरोप है कि उन्हें असुरक्षा अपराधियों से कम और सिस्टम के भीतर मौजूद कुछ प्रभावशाली तत्वों से अधिक महसूस हो रही है।
थाना : न्याय का केंद्र या ‘रणनीति कक्ष’?
सूत्रों के अनुसार, मस्तूरी थाना क्षेत्र में हालात सामान्य पुलिसिंग से अलग नजर आ रहे हैं। आरोप है कि वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों के बाद भी कुछ पुलिसकर्मियों ने आरोपियों को पूछताछ के नाम पर थाने बुलाया, लेकिन गिरफ्तारी के बजाय उन्हें यह सलाह दी गई कि किस प्रकार शिकायतकर्ता पत्रकार के खिलाफ ही उच्च अधिकारियों को शिकायतें भेजी जाएं।
यदि यह आरोप सही हैं, तो यह पुलिस तंत्र के उद्देश्य और कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है।
22 दिसंबर की बैठक और सवालों के घेरे में ‘रणनीति’
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, 22 दिसंबर की रात भनेश्वर रोड स्थित एक निजी आवास में कुछ संदिग्ध व्यक्तियों की बैठक हुई। चर्चा है कि यह सामान्य निजी आयोजन न होकर आगे की रणनीति तय करने का मंच था।
हालांकि खबर36गढ़ इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं करता, लेकिन बताया जा रहा है कि यदि CCTV फुटेज की निष्पक्ष जांच की जाए, तो कई अहम तथ्य सामने आ सकते हैं।
कबाड़ चोरी की सूचना और ‘सूचना का दुरुपयोग’?
पत्रकार द्वारा कथित कबाड़ चोरी की सूचना पुलिस को दी गई थी।
लेकिन आरोप है कि इस सूचना का उपयोग अपराध रोकने के बजाय, कथित रूप से आरोपियों को सतर्क करने में किया गया।
सूत्रों का कहना है कि इसके बाद पूरा मामला ‘सेट’ करने की कोशिश हुई, जिसमें शिकायतकर्ता पर ही दबाव बढ़ता गया।
एसडीओपी और पुरानी नाराज़गी के आरोप
मामले में एसडीओपी लालचंद मोहले का नाम भी सामने आ रहा है।
सूत्रों के अनुसार, पूर्व में प्रकाशित कुछ समाचारों के कारण वे पत्रकारों से असहज रहे हैं, और उसी की प्रतिध्वनि वर्तमान घटनाक्रम में दिखाई दे रही है—ऐसा आरोप लगाया जा रहा है।
हालांकि, ये सभी आरोप हैं और इनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
‘इंतजाम अली’ : एक नाम, कई चर्चाएं
सूत्रों के अनुसार, जांचकर्ता पुलिसकर्मी शिव चंद्रा को एसडीओपी का करीबी माना जाता है। स्थानीय स्तर पर उन्हें “इंतजाम अली” के नाम से भी जाना जाता है।
आरोप है कि वे जिन-जिन थानों में पदस्थ रहे—सीपत, रतनपुर, तोरवा, पामगढ़ और कोटा—वहाँ कोल, राखड़, मुरुम, रेत और क्रेशर माफिया से उनकी नज़दीकियाँ चर्चा में रहीं।
इतना ही नहीं, उनका नाम पूर्व में चर्चित मिट्टी तेल स्कैंडल से भी जुड़ चुका है, जिसमें माननीय न्यायालय द्वारा सख्त टिप्पणी किए जाने की बात कही जाती है।
अनुकंपा नियुक्ति और न्यायालय परिसर से जुड़ा विवाद
सूत्र यह भी बताते हैं कि इस पूरे प्रकरण में एक महिला की भूमिका सवालों के घेरे में है।
आरोप है कि अनुकंपा नियुक्ति के तहत शासकीय नौकरी मिलने के बावजूद, वे नियमित रूप से कार्य न कर केवल औपचारिक उपस्थिति दर्ज करती हैं और बाद में न्यायालय परिसर में कथित रूप से “क्लाइंट तलाशने” व अवैध उगाही जैसी गतिविधियों में संलिप्त रहती हैं।
यदि इन आरोपों की CCTV फुटेज के आधार पर जांच होती है, तो यह मामला सेवा नियमों के उल्लंघन के साथ-साथ न्यायालय परिसर की गरिमा से भी जुड़ा गंभीर विषय बन सकता है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी
यह पूरा घटनाक्रम केवल एक व्यक्ति या एक थाना तक सीमित नहीं दिखता, बल्कि यह संकेत देता है कि यदि शिकायतकर्ता और पत्रकार ही असुरक्षित हो जाएं, तो आम नागरिक के लिए न्याय की उम्मीद कैसे बचेगी?
अब आवश्यकता है एक स्वतंत्र, निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच की, ताकि सच्चाई सामने आ सके और दोषी चाहे कितना भी प्रभावशाली क्यों न हो, उसे जवाबदेह ठहराया जा सके।
खबर36गढ़ इस मामले से जुड़े हर पहलू पर नजर बनाए रखेगा।
डिस्क्लेमर
यह रिपोर्ट विभिन्न स्रोतों और स्थानीय जानकारियों पर आधारित है। इसमें लगाए गए सभी आरोप आरोप मात्र हैं, जिनकी पुष्टि जांच के बाद ही हो सकती है। संबंधित पक्षों को अपना पक्ष रखने का पूरा अवसर है।

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