रायपुर सेंट्रल की दीवारें: सत्ता की सबसे बड़ी साज़िश — कुमार जितेन्द्र का खुलासा

रायपुर सेंट्रल की दीवारें: सत्ता की सबसे बड़ी साज़िश — कुमार जितेन्द्र का खुलासा

रायपुर/विशेष रिपोर्ट।
साल 2022… रायपुर सेंट्रल जेल की ऊँची दीवारें एक बार फिर सत्ता और संघर्ष के टकराव की गवाह बनीं। सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार कुमार जितेन्द्र ने अपने जीवन की उस घटना को उजागर किया है, जिसमें सत्ता ने जन–आवाज़ को दबाने के लिए कथित रूप से साज़िश रची और उन्हें जेल भेजा गया।

> “अंबिकापुर की दीवारों ने मुझे सच दिखाया था,
रायपुर की दीवारों ने मुझे सिस्टम की रूह दिखाई।” — कुमार जितेन्द्र

पुलिस परिवार आंदोलन से पहले उठा बड़ा कदम

2021 में छत्तीसगढ़ पुलिस परिवार की मांगों में से करीब 2,000 सहायक आरक्षकों को आरक्षक बनाने का निर्णय सरकार ने स्वीकार किया था।

भारत सम्मान मंच द्वारा चलाए गए अभियान का उस समय बड़ा प्रभाव दिखा था। लेकिन जैसे-ही 2022 में पुलिस परिवार की 10 सूत्रीय मांगों को लेकर रायपुर में विशाल प्रदर्शन तय हुआ — हालात बदलते गए।

10 जनवरी 2022 — आधी रात का ऑपरेशन

कुमार जितेन्द्र 9 जनवरी की रात रायपुर पहुँचे और न्यायिक अधिकारी के सरकारी आवास में रुके।
रात ढाई बजे अचानक दरवाज़ा खुला।

15–20 पुलिस कर्मियों ने घर में घुसकर उन्हें हिरासत में ले लिया।
बाहर 25–30 पुलिस वाहन, और आंदोलन से जुड़े कई अन्य लोग भी उठाए गए।

> “कोई सवाल नहीं, कोई नोटिस नहीं… बस सत्ता का हुक्म और पुलिस की खामोश वफ़ादारी।”

कुमार के मुताबिक अधिकारियों ने साफ संकेत दिया —
सरकार आंदोलन को कुचलना चाहती थी, और उनका उठाया जाना “आवाज़ बंद” करने के लिए था।

थाना, मेडिकल और सीधा जेल

हिरासत में लिए गए कुछ साथियों को छोड़ दिया गया, परन्तु कुमार को नहीं।
शाम तक मेडिकल कराया गया — संकेत साफ था, जेल तय है।

रात में उन्हें रायपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

> “जब सच कागज़ पर कैद लिख दिया जाए, समझ लो कलम सही जगह चोट कर रही है।”

उन पर धारा 151 व 107/16 लगाई गई — जन आंदोलन को अपराध दिखाने का प्रयास, ऐसा आरोप कुमार का है।

जेल का मौन और मनोवैज्ञानिक दबाव

जेल में प्रवेश के साथ ही कई कैदियों और अधिकारियों ने पहचान जताई, और सावधान रहने की सलाह दी।
कुमार का दावा —

जेल में राजनीतिक दबाव साफ महसूस होता था

बोलने से ज़्यादा चुप कराने की कोशिश होती थी

सबसे बड़ा हथियार था — मानसिक दबाव

> “यहाँ मुकदमे नहीं, साज़िशें चलती थीं।”

14 जनवरी — जमानत और बड़ा अंतरराष्ट्रीय झटका

14 जनवरी को जमानत मिली।
बाहर आने पर पता चला —
पुलिस आंदोलन से जुड़े अन्य साथियों पर पुलिस विद्रोह की धारा 3 तक लगा दी गई थी, और उन्हें भी उसमें फँसाने की तैयारी थी।

लेकिन तभी खेल पलट गया —

Committee to Protect Journalists (CPJ)
अंतरराष्ट्रीय प्रेस-फ्रीडम संस्था ने रिपोर्ट जारी कर इसे “अवैध गिरफ्तारी” बताया।

देशभर के मीडिया ने खबर उठाई।
राजनीतिक गलियारों में आक्रोश बढ़ा और सरकार को पीछे हटना पड़ा।

कुमार बोले —

> “अगर सच बोलने की सज़ा जेल है, तो मिशन सही है।”

लेकिन कहानी यहीं नहीं रुकी…

8 अप्रैल 2022…
एक बार फिर दरवाज़ा खटखटाया गया।
एक बार फिर गिरफ्तारी।
और एक बार फिर जेल।

अगले अध्याय में पढ़ें:

“फिर से जेल — जहाँ बंदी नहीं, इंसान मिले”
वर्ष 2022 की दूसरी कैद की अनसुनी दास्तां — मनोबल टूटा नहीं, और मज़बूत हुआ।

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