रायपुर/जशपुरनगर। विशेष रिपोर्ट
प्रदेश में लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पत्रकारिता पर हमला अब सीधे जशपुर नगर जनसम्पर्क कार्यालय से किए जाने का आरोप सामने आया है। सहायक संचालक जनसम्पर्क कार्यालय नूतन सिदार द्वारा पत्रकारों को धमकी भरा कानूनी नोटिस भेजा गया है, जिसने बड़ा विवाद खड़ा कर दिया है।
सबसे अहम सवाल यह उठ रहा है कि –
क्या नूतन सिदार ने नोटिस भेजने से पहले शासन/प्रशासन से अनुमति ली थी?
अगर अनुमति नहीं ली गई तो क्या यह सेवा आचरण नियमों का खुला उल्लंघन नहीं है?
सरकारी सेवा नियम साफ कहते हैं कि कोई भी शासकीय कर्मचारी यदि अपने पदनाम का इस्तेमाल करते हुए किसी कानूनी कार्यवाही की पहल करता है तो उसे अपने उच्च अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य होता है। लेकिन यहाँ तो अधिकारी ने स्वयं ही पत्रकारों को धमकाने का कदम उठा लिया।
पत्रकार संगठनों ने इसे सीधा हमला बताया है। उनका कहना है –
“सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून की बात करती है, लेकिन यहां सरकारी अधिकारी ही पत्रकारों को धमका रहे हैं। क्या यही है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता? क्या यही है लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका?”
यह घटनाक्रम साफ संकेत देता है कि अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। पत्रकारों पर ब्लैकमेलिंग का ठप्पा लगाकर मानहानि का मुकदमा ठोंकना प्रशासन के कुछ लोगों की सच दबाने की कोशिश मानी जा रही है। लेकिन सवाल यह है कि – क्या सच को दबाया जा सकता है? क्या पत्रकारों की आवाज़ को कुचला जा सकता है?
अब प्रदेशभर में चर्चा है कि –
क्या जशपुर नगर के कलेक्टर और जनसम्पर्क विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस मामले में संज्ञान लेंगे?
या फिर यह मामला भी फाइलों में दब जाएगा और अधिकारी नियमों को तोड़ते रहेंगे?
यह केवल एक नोटिस का मामला नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र में पत्रकारिता की आज़ादी बनाम अधिकारीशाही की दबंगई का मुद्दा बन चुका है। अगर बिना अनुमति लिए नोटिस भेजने पर भी कार्रवाई नहीं होती, तो इसका सीधा संदेश होगा कि प्रशासन स्वयं अपने अधिकारियों को पत्रकारों पर अत्याचार करने की खुली छूट दे रहा है।
अब जनता और पत्रकार समाज प्रशासन से यह सवाल कर रहा है –
“क्या जशपुर का प्रशासन इतना कमजोर है कि एक अधिकारी अपने पद का दुरुपयोग करके पत्रकारों को खुलेआम धमकाए और फिर भी बच निकले?”
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अब जानते हैं – Central Civil Services (Conduct) Rules, 1964
यह नियम 1964 में अधिसूचित हुआ और 1 जनवरी 1965 से लागू हुआ।
इसका उद्देश्य है – सरकारी कर्मचारियों के लिए आचार संहिता तय करना ताकि वे ईमानदारी, निष्पक्षता और जवाबदेही बनाए रखें।
यह भारत सरकार के सभी सिविल सेवकों पर लागू होता है। राज्य सरकारों ने भी इसी तर्ज़ पर अपने-अपने नियम बनाए हैं।
मुख्य प्रावधान एक नजर में:
1. सरकारी सेवक को ईमानदार और निष्पक्ष होना होगा।
2. राजनीतिक गतिविधियों पर रोक है।
3. रिश्वतखोरी और अनुचित लाभ लेना प्रतिबंधित है।
4. संपत्ति और निवेश की जानकारी अनिवार्य है।
5. निजी व्यापार/नौकरी बिना अनुमति नहीं कर सकते।
6. प्रेस/मीडिया से जुड़ा कार्य बिना अनुमति नहीं कर सकते।
7. हड़ताल/प्रदर्शन में शामिल नहीं हो सकते।
8. सार्वजनिक रूप से सरकार/वरिष्ठ की आलोचना नहीं कर सकते।
9. उच्चतम ईमानदारी और निष्पक्षता बनाए रखनी होगी।
10. महिलाओं और कमजोर वर्गों के प्रति अनुचित आचरण गंभीर अपराध है।
11. Rule 23 – Vindication of Acts and Character: यदि कोई सरकारी सेवक मानहानि के आरोपों से खुद को बचाना चाहता है तो उसे सरकार से अनुमति लेना अनिवार्य है।
उल्लंघन के परिणाम:
चेतावनी, वेतन कटौती, पदावनति, निलंबन से लेकर बर्खास्तगी तक कार्रवाई संभव है।
सारांश:
सिविल सेवा आचरण नियम, 1964 (लागू 1965 से) सरकारी कर्मचारियों के लिए आचार संहिता है, जिसमें यह सुनिश्चित किया गया है कि कर्मचारी ईमानदार, निष्पक्ष और निष्ठावान बने रहें, और उनकी कार्यप्रणाली से सरकार की विश्वसनीयता बनी रहे।

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