वादों की ‘राख’ में दबे ग्रामीण: मजदूर दिवस पर एनटीपीसी के खिलाफ बड़ा आंदोलन

वादों की ‘राख’ में दबे ग्रामीण: मजदूर दिवस पर एनटीपीसी के खिलाफ बड़ा आंदोलन

बिलासपुर (छत्तीसगढ़) | विशेष रिपोर्ट
जिले से करीब 15 किलोमीटर दूर स्थित NTPC Limited के सीपत संयंत्र को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश अब खुलकर सामने आ गया है। वर्षों से लंबित मांगों, वादाखिलाफी और कथित भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच 1 मई, यानी मजदूर दिवस पर बड़ा जनआंदोलन होने जा रहा है। प्रभावित गांवों के ग्रामीण सुखरीपाली स्थित ठाकुर देव द्वार पर 24 सूत्रीय मांगों को लेकर प्रदर्शन करेंगे।
वादों से विरोध तक: क्यों भड़का जनाक्रोश?
ग्रामीणों का आरोप है कि प्रबंधन ने कई बार बैठकें कर आश्वासन तो दिए, लेकिन जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। 9 मार्च को प्रस्तावित आंदोलन को 1 मई तक टाल दिया गया था, लेकिन तय समयसीमा के बावजूद समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। इससे ग्रामीणों में गहरी नाराजगी है और अब वे आर-पार की लड़ाई के मूड में हैं।
भ्रष्टाचार के आरोप, CBI जांच की मांग
स्थानीय जनप्रतिनिधियों—नरेन्द्र वस्त्रकार और रेवा शंकर साहू—ने फ्लाई ऐश विभाग के AGM पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि फर्जी ट्रांसपोर्टरों को संरक्षण देकर बड़े पैमाने पर गड़बड़ी की जा रही है।
मामले की जांच Central Bureau of Investigation (CBI) से कराने की मांग की गई है।
मुख्य आरोप:
एक ही वाहन पर कई नेम प्लेट लगाकर फर्जी बिलिंग
‘सेनोस्फीयर’ जैसे प्रतिबंधित पदार्थ की अवैध निकासी
संदिग्ध वित्तीय लेन-देन
ग्रामीणों का दावा है कि निष्पक्ष जांच होने पर करोड़ों के घोटाले उजागर हो सकते हैं।
रोजगार में गड़बड़ी, मजदूरों का शोषण
रोजगार को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं:
आदिवासियों के लिए आरक्षित 152 पद अब तक लंबित
692 पदों की भर्ती में अनियमितता के आरोप
स्थानीय युवाओं की जगह बाहरी लोगों को कथित रूप से पैसे लेकर नौकरी
मजदूरों को तय मजदूरी ₹541 के बजाय ₹300–350 का भुगतान
यह स्थिति Minimum Wages Act, 1948 के उल्लंघन की ओर इशारा करती है।
पर्यावरण संकट: राख से तबाह खेती
राख डाइक से रिसाव के कारण ग्रामीणों को भारी नुकसान झेलना पड़ रहा है:
उपजाऊ खेत दलदल में तब्दील
नहरों में राख जमने से सिंचाई बाधित
पशुओं की मौत के मामले
उड़ती राख से स्वास्थ्य समस्याएं
यह मामला Environment Protection Act, 1986 और National Green Tribunal (NGT) के नियमों के उल्लंघन से जुड़ा बताया जा रहा है।
सड़कें बदहाल, CSR फंड पर सवाल
ग्रामीणों के अनुसार:
14 टन क्षमता वाली सड़कों पर 60–70 टन के भारी वाहन दौड़ रहे हैं
“घूमना पुल” पिछले 4 वर्षों से जर्जर हालत में है
शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं में CSR फंड का उपयोग नहीं
यह Companies Act, 2013 के CSR प्रावधानों की अनदेखी मानी जा रही है।
धमकी और दमन के आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि आवाज उठाने पर उन्हें National Security Act, 1980 (रासुका) लगाने की धमकी दी जाती है, जिसे उन्होंने लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन बताया है।
प्रबंधन की चुप्पी
मामले पर पक्ष जानने के लिए AGM से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया। इससे प्रबंधन की भूमिका पर सवाल और गहरा गया है।
विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों के अनुसार, यह मामला केवल स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि श्रम कानून, पर्यावरणीय नियमों और आदिवासी अधिकारों से जुड़े गंभीर उल्लंघनों का संकेत देता है। यदि निष्पक्ष जांच होती है, तो कई स्तरों पर कार्रवाई संभव है।
अब नजर 1 मई पर
मजदूर दिवस पर प्रस्तावित यह आंदोलन निर्णायक साबित हो सकता है। यदि प्रशासन और प्रबंधन ने समय रहते समाधान नहीं निकाला, तो यह विरोध व्यापक जनआंदोलन का रूप ले सकता है।
फिलहाल सवाल यही है—क्या इस बार ग्रामीणों की आवाज सुनी जाएगी, या फिर वादों की ‘राख’ में ही दबकर रह जाएगी?

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