
प्रधान आरक्षक पर अवैध कब्जा और निर्माण के आरोप, प्रशासन ने सख्ती दिखाते हुए काम रुकवाया
अम्बिकापुर/सरगुजा | विशेष रिपोर्ट
सरगुजा संभाग के अम्बिकापुर में सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसमें पुलिस विभाग के एक प्रधान आरक्षक पर ही नियमों की अनदेखी करने का आरोप लगा है। शिकायत के बाद प्रशासन ने तत्काल संज्ञान लेते हुए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी है और अतिक्रमण हटाने के लिए 20 मार्च 2026 तक का अल्टीमेटम जारी किया है।
🔎 शिकायत के बाद खुलासा
यह मामला ग्राम अजीरमा (पटवारी हल्का नंबर-56) का है, जहां शासकीय भूमि खसरा नंबर 74/1, रकबा लगभग 2.480 हेक्टेयर में से करीब 0.700 हेक्टेयर भूमि पर अवैध कब्जे की शिकायत की गई।
शिकायतकर्ता जितेन्द्र कुमार जायसवाल ने आरोप लगाया कि प्रधान आरक्षक रविन्द्र भारती द्वारा जमीन पर शेड और बाउंड्री निर्माण के साथ-साथ खेती (मक्का फसल) भी की जा रही थी।
⚠️ ड्यूटी से नदारद, जमीन पर सक्रिय?
सूत्रों के मुताबिक, संबंधित प्रधान आरक्षक का तबादला एमसीबी जिले में हो चुका है, लेकिन वे कथित रूप से सूरजपुर पुलिस लाइन में अटैच रहे।
बताया जा रहा है कि वे करीब एक महीने से ड्यूटी से भी गायब हैं, जबकि इस दौरान जमीन पर गतिविधियां जारी थीं।
️ प्रशासन का सख्त रुख
राजस्व निरीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर अतिरिक्त तहसीलदार न्यायालय, अम्बिकापुर-02 ने सख्त आदेश जारी किए हैं:
शासकीय भूमि पर चल रहा निर्माण तत्काल बंद किया जाए
संबंधित व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थित होकर दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे
20 मार्च 2026 तक अतिक्रमण हटाने का निर्देश
समय सीमा के बाद एकपक्षीय कार्रवाई की चेतावनी
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई का खर्च संबंधित व्यक्ति से वसूला जाएगा
अमले को भी दिए गए निर्देश
प्रशासन ने थाना प्रभारी गांधीनगर, राजस्व निरीक्षक और हल्का पटवारी को निर्देशित किया है कि:
मौके पर पहुंचकर निर्माण कार्य रुकवाएं
नोटिस की तामील सुनिश्चित करें
तय समय सीमा में पालन प्रतिवेदन प्रस्तुत करें
⚖️ कानून बनाम वर्दी
छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 248 के तहत सरकारी भूमि पर कब्जा दंडनीय अपराध है।
ऐसे में जब आरोप किसी पुलिसकर्मी पर लगे, तो यह मामला और संवेदनशील हो जाता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि वर्दीधारी ही नियमों का उल्लंघन करें, तो आम नागरिकों में कानून के प्रति विश्वास कमजोर होता है।
अब प्रशासन की परीक्षा
यह मामला अब केवल जमीन विवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही की कसौटी बन गया है।
अब देखना होगा:
क्या समयसीमा के भीतर अतिक्रमण हटेगा?
क्या संबंधित पुलिसकर्मी पर विभागीय कार्रवाई होगी?
या मामला केवल कागजों तक सिमट कर रह जाएगा?
♦️ निष्कर्ष
अम्बिकापुर का यह मामला साफ संकेत देता है कि कानून सभी के लिए समान होना चाहिए—चाहे आम नागरिक हो या वर्दीधारी। अब सबकी नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।

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