अंबिकापुर में पत्रकार से मारपीट: FIR दर्ज, गिरफ्तारी नहीं, प्रदेशव्यापी आंदोलन की चेतावनी


अंबिकापुर/सरगुजा।
✍️छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर में एक पत्रकार के साथ कथित मारपीट की घटना ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली, राजनीतिक दबाव और प्रेस की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद कोतवाली थाना अंबिकापुर में अपराध क्रमांक 0128/2026 दर्ज किया गया है, लेकिन समाचार लिखे जाने तक किसी भी नामजद आरोपी की गिरफ्तारी नहीं हुई है।
🩸क्या है पूरा मामला?
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, शहर के व्यस्त गुदड़ी चौक क्षेत्र में कुछ राजनीतिक कार्यकर्ता नारेबाजी और प्रदर्शन कर रहे थे। माहौल धीरे-धीरे तनावपूर्ण होता जा रहा था। इसी दौरान एक स्थानीय पत्रकार मौके पर पहुंचा और स्थिति की वीडियो रिकॉर्डिंग करने लगा।
बताया जाता है कि कैमरा ऑन होते ही कुछ कार्यकर्ता भड़क उठे और पत्रकार पर रिकॉर्डिंग बंद करने का दबाव बनाया। पत्रकार द्वारा इसे अपने पेशेवर दायित्व का हिस्सा बताते हुए रिकॉर्डिंग जारी रखने पर कथित रूप से धक्का-मुक्की और मारपीट की गई। आरोप है कि जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए जान से मारने की धमकी भी दी गई।
घटना सार्वजनिक स्थान पर हुई, जहां आम लोग और पुलिसकर्मी मौजूद थे। एफआईआर में तीन आरोपियों को नामजद किया गया है।
🩸गंभीर धाराओं में मामला दर्ज
पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 की विभिन्न धाराओं के साथ-साथ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत प्रकरण दर्ज किया है। इन धाराओं के तहत मामला गंभीर श्रेणी में आता है, जिसके बावजूद अब तक गिरफ्तारी न होना कई सवाल खड़े कर रहा है।
“🩸आपको विधायक को जवाब देना होगा” – बयान ने बढ़ाई चिंता
घटना के दौरान कथित रूप से एक पुलिस अधिकारी के सामने यह कहा गया—
“आपको विधायक को जवाब देना होगा।”
इस कथन को लेकर चर्चाएं तेज हैं। इसे कानून से ऊपर राजनीतिक संरक्षण का संकेत माना जा रहा है। जानकारों का कहना है कि पुलिस की जवाबदेही संविधान और कानून के प्रति होती है, न कि किसी जनप्रतिनिधि की व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के प्रति।
✍️प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला?
लोकतंत्र में मीडिया को चौथा स्तंभ माना जाता है। सार्वजनिक घटनाओं की रिपोर्टिंग और रिकॉर्डिंग पत्रकार का अधिकार ही नहीं, बल्कि कर्तव्य भी है। यदि इस पर हिंसक प्रतिक्रिया होती है, तो यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आघात माना जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाएं लोकतांत्रिक ढांचे को कमजोर करती हैं और समाज में भय का वातावरण पैदा करती हैं।
🩸गिरफ्तारी नहीं, आंदोलन की चेतावनी
मामले में अब तक गिरफ्तारी नहीं होने से पत्रकार संगठनों और सामाजिक संगठनों में आक्रोश है। पत्रकार प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र कार्रवाई नहीं की गई, तो प्रदेश स्तर पर चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा।
संभावित कार्यक्रमों में धरना-प्रदर्शन, ज्ञापन सौंपना और व्यापक विरोध शामिल हो सकते हैं।
🩸बड़ा सवाल
सरगुजा अंचल की यह घटना केवल स्थानीय विवाद नहीं, बल्कि व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न खड़ा करती है—
क्या कानून सर्वोपरि है, या सत्ता के प्रभाव से उसकी धार कुंद हो रही है?
यदि सार्वजनिक स्थान पर पत्रकार सुरक्षित नहीं है, तो आम नागरिक की सुरक्षा का प्रश्न और भी गंभीर हो जाता है। अब सबकी निगाहें प्रशासन और राजनीतिक नेतृत्व की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं।

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